[1]
डॉ. विश्वजित् बर्मन, “भारतीय जीवनदर्शन में पुरुषार्थ-चतुष्टय और वर्तमान समाज में उसका महत्व”, sampreshan, vol. 15, no. 4, pp. 95–108, Nov. 2025.